एक किताब ने तोड़े कोविड के कई मिथक

डॉ. अमिताव बनर्जी की कोविड-19 पैन्डेमिक: ए थर्ड आई नामक किताब है तो मात्र 107 पेजों की, लेकिन यह पतली सी किताब ऐसे अनेक समूहों पर वार करने के लिए काफी है, जिन्होंने मिलकर महामारी की पटकथा को बड़ी होशियारी से लिख डाला।

रत्ना एवं नदीम सिराज

January 30, 2023: अंधकार युग वापस आ गया है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब संदिग्ध कोविड कथा पर सवाल उठाना ईशनिंदा के समान माना जाता है। ऐसे समय में एक किताब सामने आई है जो महामारी के नाम पर हुई धांधली को उजागर करती है और कुछ मिथकों को झुठलाती है।

डॉ. अमिताव बनर्जी की कोविड-19 पैन्डेमिक: ए थर्ड आई नामक किताब है तो मात्र 107 पेजों की, लेकिन यह पतली सी किताब ऐसे अनेक समूहों पर वार करने के लिए काफी है, जिन्होंने मिलकर महामारी की पटकथा को बड़ी होशियारी से लिख डाला। इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन, सीडीसी, लैंसेट, बीएमजे, इकोनॉमिक यूनियन, फार्मा कंपनियां, जीएवीआई, सोशल मीडिया, फाउंडेशन, बहु-राष्ट्रीय कंपनियां, सरकारें, राजशाही, और मुख्यधारा का मीडिया शामिल है।

डॉ. बनर्जी एक सेवानिवृत्त महामारी विशेषज्ञ हैं, जो अब पुणे के डॉ. डी वाई पाटिल कॉलेज में पढ़ाते हैं, जहां वे सामुदायिक चिकित्सा के प्रमुख हैं। उन्होंने अपना जीवनकाल भारतीय सेना के साथ एक महामारी विज्ञानी के रूप में बिताया। अपने जीवन के एक चरण में सरकार के लिए काम करने के बावजूद, आलोचनात्मक सोच वाले डॉक्टर महामारी से निपटने में सरकार की भूमिका पर खुले तौर पर सवाल उठाते हैं। बेशक, वह बिग फार्मा और मुख्यधारा के मीडिया को भी लोकप्रिय और भ्रामक कोविड कथा को हवा देने के लिए लताड़ते हैं।

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पुस्तक पहले से प्रकाशित लेखों का एक संग्रह है जिसमें डॉ. बनर्जी तथ्यों और सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए अपने तर्क पेश करते हैं। धारा के विपरीत लिखी गई इस किताब के हर पृष्ठ से सवाल उछलते हैं, जो मीडिया द्वारा फैलाए गए डर, लॉकडाउन के औचित्य, अप्रमाणित शारीरिक दूरी (जिसे भ्रामक रूप से ‘सामाजिक दूरी’ नाम दिया गया), हानिकारक मास्क की  अनिवार्यता, अवैध वैक्सीन की अनिवार्यता, और बच्चों को टीका लगाने की अत्यावश्यकता जैसी नीतियों पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

भय की महामारी

लेखक ने 2020 की शुरुआत में कोरोनोवायरस प्रकोप की खबर आने पर बड़े पैमाने पर भयभीत करने के लिए दुनिया भर के प्रशासनों, विशेष रूप से भारत सरकार की निंदा की है। वायरस का पता चलने पर, जनता को सावधान और शिक्षित करने के बजाय, डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने लोगों को डराने के लिए पूर्व से पश्चिम तक की सरकारों पर दबाव बनाया।

डॉ. बनर्जी की किताब इस घटना को अजीब और हानिकारक मानती है। उन्होंने लिखा कि “भय की महामारी एक मध्यकालीन युग की याद दिलाती है। नियंत्रण का भ्रम पैदा करके जल्दबाजी में निर्णय लिए गए। ऐसे कच्चे और अनाड़ी उपायों से समाज खंडित होता है।”

वह यह भी याद करते हैं कि मार्च 2020 में, लैंसेट जर्नल ने सुझाव दिया था कि नए फ्लू से मृत्यु दर 20% तक हो सकती है, जो बाद के सीरो सर्वेक्षणों के अनुसार एक झूठा अलार्म साबित हुआ।

एक अन्य अध्याय में, वह लिखते हैं, “महामारी में एकमात्र विषय था ‘डर’। प्रमुख लोकतंत्रों सहित लगभग सभी देशों के नागरिकों ने उन उपायों पर अमल किया जो उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करते थे और जो आतंक द्वारा संचालित थे।

दुनिया भर में मुश्किल लॉकडाउन को अभूतपूर्व बताते हुए, प्रकोप और रोग नियंत्रण के दिग्गज लिखते हैं कि कोविड -19 रातोंरात एक ऐसी बीमारी में बदल गया जिसके बारे में पूरी दुनिया को चिंता करनी चाहिए, जबकि अन्य सभी बीमारियों को नजरअंदाज किया गया। पुस्तक याद करती है कि कैसे टीवी, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो और सोशल मीडिया द्वारा प्रकोप के बारे में उत्तेजक समाचारों से भय फैलाकर अन्य सभी स्वास्थ्य संकटों को बौना कर दिया गया।

पुस्तक 2021 की गर्मियों में गलत रिपोर्टिंग के एक निश्चित उदाहरण का हवाला देती है जिसके चलते दुनिया भर में गलत तरीके से सख्त बाहरी नियम लागू हो गए। न्यूयॉर्क टाइम्स ने 26 मई, 2021 को अमेरिका स्थित सीडीसी (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) के एक दिशानिर्देश का हवाला दिया देते हुए लिखा कि वायरस के बाहरी संचरण का जोखिम 10% था। बाद में, कई देशों द्वारा खतरनाक दिशानिर्देशों पर कार्रवाई करने और बाहरी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के बाद, सीडीसी ने स्वीकार किया कि उसने गलती से बाहरी प्रसारण का जोखिम 10% कह दिया, जबकि वास्तव में यह 0.1% था!

सीडीसी, डब्ल्यूएचओ और बिग फार्मा के लिए अति-सम्मान के कारण मुख्यधारा के मीडिया द्वारा व्यापक रूप से यह निंदनीय प्रकरण रिपोर्ट नहीं किया गया।

एक दिलचस्प बिंदु जो उन्होंने उठाया वह है सरकार द्वारा निर्देशित मुख्यधारा का मीडिया केवल कोविड की मौतों पर ध्यान केंद्रित करता है और कुछ नहीं, भले ही टीबी से भारत में प्रतिदिन लगभग 1,500 लोगों की मौत हो जाती है और देश हर दिन लगभग 2,000 बच्चों को ऐसे रोगों से मरते देखता है, जिन्हें रोका जा सकता है।

वैक्सीन, एक बड़ा जुआ

डॉक्टर, टीकों के बारे में अपने आशावादी नजरिए के बावजूद, कोविड -19 वैक्सीन के रोल-आउट को जल्दबाजी और एक “बड़ा जुआ” कहते हैं। वह भारत में टीबी के टीके का उदाहरण देते हैं, जिसने इतने दशकों के बाद भी बीमारी के प्रभाव को शायद ही कम किया हो। लेखक ने पुस्तक में चेतावनी दी है कि महामारी के बीच में कोई भी टीकाकरण अभियान उल्टा पड़ सकता है और म्यूटेंट को जन्म दे सकता है। ठीक यही हमने वायरस के ओमिक्रॉन, डेल्टाक्रॉन, लैम्ब्डा और एक्सई वेरिएंट के साथ होते देखा।

डॉ. बनर्जी नए फ्लू के खिलाफ बच्चों का टीकाकरण करने की अस्पष्ट अत्यावश्यकता से हैरान हैं। आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर उनका तर्क है, “बिना सह-रुग्णता (को-मॉर्बिडिटी) वाले युवा वयस्क शायद ही कभी अस्पतालों में पहुंचे या संक्रमण से मरे … कायदे से मौतों को रोकने के उपाय होने चाहिए थे, जिनमें से अधिकांश वृद्धावस्था के कारण हुईं।”

पुस्तक इस मोर्चे पर एक उदाहरण के रूप में स्वीडन की सराहना करती है। नॉर्डिक देश की सरकार दुनिया में एकमात्र ऐसी सरकार थी जिसने महामारी के दौरान और यहां तक कि वैश्विक लॉकडाउन के चरम दौर में भी स्कूलों को खुला रखा। विशेष रूप से, स्वीडन में कई अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में कोविड से संबंधित मौतों की संख्या कम रही। फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, चेक, बेल्जियम, हंगरी जैसे देशों ने मास्क, सख्त लॉकडाउन और शारीरिक दूरी के मानदंडों का पालन किया लेकिन वहां हालात खराब रहे।

बच्चों के टीकाकरण के विषय पर वापस लौटते हुए लेखक कहते हैं कि पर्याप्त सरकारी डेटा है जो दिखाता है कि नया फ्लू बच्चों पर कम कठोर है। वह लिखते हैं कि महामारी के चरम के दौरान बच्चों की 99.67% मौतें हुईं, लेकिन उनकी वजह कोविड-19 नहीं, बल्कि अन्य कारण थे।

एक और मोर्चा जिस पर पुस्तक एक प्रासंगिक सवाल दागती है, वह है महामारी की शुरुआत और सामूहिक टीकाकरण अभियान की शुरुआत के बीच समय-समय पर किए गए सीरोसर्वे पर ध्यान न दिया जाना। जून 2021 में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा किए गए एक सीरोसर्वे को डॉ. बनर्जी ने उपयुक्त रूप से उद्धृत किया है। इससे पता चला कि 67.6% भारतीयों में कोविड एंटीबॉडी थी, जिसका अर्थ है कि उस समय 82 करोड़ भारतीयों ने या तो कोविड संक्रमण के कारण या टीकों के कारण बीमारी के खिलाफ प्राकृतिक प्रतिरक्षा विकसित कर ली थी।

अब, उस आईसीएमआर सीरो सर्वे के समय, केवल 20% भारतीयों ने एक ही शॉट लिया था, जबकि केवल 5% को डबल जैब लगा था। तो, गणित के हिसाब से, उस समय लगभग 75 करोड़ भारतीयों ने वायरस से प्राकृतिक संक्रमण के माध्यम से नए फ्लू के खिलाफ पहले ही प्राकृतिक प्रतिरक्षा विकसित कर ली थी।

यह उदाहरण कई जिम्मेदार डॉक्टरों द्वारा प्रस्तुत एक तर्क की ओर इशारा करता है, जो कहते हैं कि झुंड प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) इस बीमारी का सबसे अच्छा जवाब है, न कि जल्दबाजी में तैयार किया गया बिना परीक्षण वाला टीका।

कंप्यूटर से उठाए भ्रामक आंकड़े

‘ए थर्ड आई’ में दिए गए कई अन्य प्रेरक तर्कों के बीच, लेखक ने आधुनिक समय के “माउस-क्लिक एपिडेमियोलॉजिस्ट्स” की आलोचना की है, जो अनुमानित कोविड मौत के आंकड़ों के बेतुके और गलत दावे करने के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर मौजूद डेटा पर भरोसा कर रहे हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि ” मॉडल में मनुष्य को सामाजिक प्राणियों के बजाय निष्क्रिय इकाइयों के रूप में पेश किया गया।”

लेखक महामारी से निपटने के पश्चिमी मॉडल की “सामूहिक नकल” करके वायरस पर “नियंत्रण के भ्रम” के तहत जीने के लिए, भारत के मुख्यधारा के चिकित्सा समुदाय की भी आलोचना करता है। नतीजा क्या निकला? कठिन लॉकडाउन जैसे उपाय रोगज़नक़ों को पूरी तरह से रोकने में विफल रहे, जबकि देश की नाजुक अर्थव्यवस्था शटडाउन के प्रभाव से नीचे गिर गई।

वैज्ञानिक एवं चिकित्सा शब्दावली के साथ, एक अनुभवी फील्ड एपिडेमियोलॉजिस्ट द्वारा लिखी होने के बावजूद, किताब  औसत पाठक को मुश्किल नहीं लगती। इसके बजाय, डॉ. बनर्जी ने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए दिलचस्प लोगों को उद्धृत करके और ऐतिहासिक उपाख्यानों का हवाला देकर इसे प्रेरक बना दिया है।

सन त्ज़ु के ज्ञान के उद्धरण, मैरी एंटोनेट की लेट-देम-हैव-केक कहानी, ट्वेंटी20 क्रिकेट से समानता, डेविड-गोलियथ कथा, सैन्य रणनीति से सबक, हिप्पोक्रेट्स का दर्शन, और डेविड ड्यूश के उदाहरण पुस्तक की पठनीयता को बढ़ाते हैं। इस वजह से यह जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए आकर्षक बन पड़ी है। किताब का शीर्षक शायद थोड़ा अधिक आक्रामक होना चाहिए था। इसके आगामी संशोधित संस्करणों में, डेटा और शोध को प्रमाणित करने के लिए कुछ फुटनोट जोड़ कर किताब को और अधिक बुलेटप्रूफ बनाया जा सकता है।

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